रविवार, 25 सितंबर 2011


यह  हाशिये पर के उस आदमी की कविता है    
जिसके मौन के पीछे 
एक उफनती हुई नदी
पहाड़ों 
जंगलों
को चीरती हुई
सदियों से कसी हुई मुट्ठी को
खोलने
लोहे के लोगों को
आदमी होने का
अहसास कराने 
चली आ रही है
और जो आदमी
सदियों  तक
गले तक
मिटटी में दफ़न रहने के बाद
ज्वालामुखी बनने  जा रहा है
यह  हाशिये पर के उसी आदमी की कविता है


गुरुवार, 8 सितंबर 2011

आशा



.1
यह  हाशिये पर के उसी आदमी की कविता है
जिसके मौन के पीछे
एक उफनती हुई नदी
पहाड़ों
जंगलों
को चीरती हुई
सदियों से कसी हुई मुट्ठी को
खोलने
लोहे के लोगों को
आदमी होने का
अहसास करने
चली आ रही है
और जो आदमी
सदियोह तक
गले तक
मिटटी में दफ़न रहने के बाद
ज्वालामुखी बन्ने जा रहा है
यह  हाशिये पर के उसी आदमी की कविता है

.2
यह  हाशिये पर के उसी आदमी की कविता है
जो शोषण की आग को
चीर कर निकलने की तैयारी में है
और स्वयं तपता जा रहा है
और जिसके तपन से
आस पास के संवेदनहीन पहाड़
मृत पत्थर
पिघलते चले जा रहे हैं
और जो धुंए से निकल कर
अब आग बनने जा रहा है
और जिसके भय से
कटीली झाड़ियां भाग रही हैं
यह  हाशिये पर के उसी आदमी की कविता है

3

यह  हाशिये पर के उसी आदमी की कविता है
जो दूसरों का हाथ
दूसरों का पैर
और दूसरों का शरीर बन कर
नहीं रहना चाहता
और जिसने अपनी विवशता को
अपने इरादे से रोक दिया है
और जो बिना कोई नारा दिए
स्वयं क्रांति बनता जा रहा है
पहाड़ी नदी की तरह
बहता जा रहा है
यह  हाशिये पर के उसी आदमी की कविता है

4

यह  हाशिये पर के उसी आदमी की कविता है
जो खूनी पहाड़ों
और हिंसक जंगलों को
बार-बार आगाह कर रहा है
सामाजिक बनने के लिए
समतल होने के लिए
वह वैसे पहाड़ों और जंगलों को
पैदा करता चला आ रहा है
जिनमें संवेदना की नदी
कलकल करती है
जिनमें करुणा की झीलें
अमृत से भरी हैं
और जिनमें प्रेमपूरित चिड़ियों का वास है
और जो एक नई दुनिया की बुनियाद
रख रहा है
यह  हाशिये पर के उसी आदमी की कविता है

5

यह  हाशिये पर के उसी आदमी की कविता है
जिसके हाथ में
वह वाण लग गया है
जो खारे समुद्र को सुखा सकता है
जो रावण की नाभी के अमृत घट को
छिन्न-भिन्न कर सकता है
और जो
अहंकार रूपी काले बादल को उड़ा कर
तपते रेगिस्तान में ले जा सकता है
वहां उसे बरसने के लिए मजबूर कर सकता है
और परिणामत:
अस्तित्वहीन कर सकता है
और जो बहरों को
उनका इतिहास सुनाने जा रहा है
और जो अपने मौन में शिव शब्द भर रहा है
यह  हाशिये पर के उसी आदमी की कविता है

6

यह  हाशिये पर के उसी आदमी की कविता है
जो परिवर्तन का
चक्रवात बनता जा रहा है
पृथ्वी का नया
चित्रकार बनता जा रहा है
जिसकी शब्दहीन भाषा
कानून बनने जा रही है
जिसके पांवों की जंजीर
न्यायाधीश का दंड बनने जा रही है
जो मानवता की कलम से
धरती पर इतिहास लिखेगा
और जो
आकाश पर अपना मानवीय संदेश
यह  हाशिये पर के उसी आदमी की कविता है



सोमवार, 21 मार्च 2011

४७

यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है  
जो दूसरों का 
घर बनाते  बनाते
स्वयं बेघर हो जाता  है
और जो 
हर गृह-प्रवेश के बाद
अपने हाथों  बनाए घर के लिए
अछूत हो जाता है 
और जो 
दूसरों के परिवार की सेवा करते करते
अपना परिवार भूल जाता है 
और एक दिन लावारिश 
मर जाता है 
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है

४८







यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जो दूसरों को
भोजन कराते कराते
एक दिन
स्वयं
भोजन बन जाता है/और
जो पान की गिलोरी  की तरह
चबाया और चूसा जाता है
और अंततः  
पीकदान के हवाले कर दिया जाता है
जो रसहीन होने के बाद
बाज़ार के कूड़ेदान में
समर्पित कर दिया जाता है
और शेषतः  
खाद या और कुछ.....!
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है

४९

यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जो रात का खिलौना
और दिन का
चाकर होता है
जिसका कोई पता नहीं होता
पर जो लापता भी नहीं होता
जिसका कोई परिचय नहीं होता
पर जिसका परिचय
बड़े बड़े लोग
बनाते और बिगाड़ते  रहते हैं
और जो
हर नए परिचय में
ढल जाता है
और मरने से पहले जो
अपने सारे
परिचयों से
मुक्त हो जाता है
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है





मंगलवार, 15 मार्च 2011

१८ - २१ हाशिए पर के



१८

यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जिसकी जांघों पर
असमय
अनेक लाल फूल
खिला दिए जाते हैं
और जो आदमी
समझ भी नहीं पाता
अचानक उग आये फूलों को
और जब वह
उन्हें समझ पाता है
उससे समझने का अधिकार ही
छीन लिया जाता है
और जिसकी आत्मा पर
महात्मागण
योग करते हैं
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है

१९

यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जिसके सपनों के ऊपर
लोग अपने सपने जड़ देते हैं
और जिसके रोते हांफते ह्रदय पर 
लोग घाव बना देते हैं
और उस पर नमक
छिड़क देते हैं
और जिसकी  दुखती रगों पर
लोग छेड़-छाड़  करने से
कभी बाज नहीं आते हैं
और जिसे लोग
अपना   काम पूरा होते ही   
एक झटके में
बाहर का रास्ता दिख देता हैं
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है


२०

यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जो यह हिसाब नहीं रख पाता कि
कितनी बार उसकी साँसें फूलीं
कितनी बार उसकी आत्मा चींखी
कितनी बार उसका दिल दरका
कितनी बार उसके प्राण
कंठ में अंटके
और जिसे लोग परदे में
बेपर्दा करते हैं
और खुले में
कानी आँख से भी नहीं देखते
और जो
अपनी छोटी सी जिन्दगी में
अनेक बार मौत से सामना करते हुए
मिट्टी में मिल जाता है
और जिस मिट्टी पर
किसी के आंसू नहीं गिरते
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है

२१

यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जिसकी झोपड़ी
वक्त वक्त पर
फरेबी आशिकों की
महफ़िल बन जाती है
और तब
उसकी झोंपड़ी का हर तिनका
उसके तन-बदन में
सूई की तरह
चुभन पैदा करने लगता है
वह जो अपनी झोंपड़ी के अन्दर
और झोंपड़ी के बाहर
भय की चादर में लिपटा होता है
और जिसकी जिन्दगी
तभी तक चलती है
जब तक
लोग उसे भयभीत करते रहते हैं
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है







सोमवार, 14 मार्च 2011

१४- १७हाशिए........

१४

यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जो दस को सुलाने के बाद
स्वयं सोना भूल जाता है
और जो
स्वयं पर लिखी जा रही
रोती-बिलखती पंक्तियों वाली
तड़पती-कांपती कविताओं को
पढ़ नहीं पाता
और जो हमेशा अर्ध-चेतना में
विवश चूहे की तरह
बिल्ली का खेल
मूक बन कर
बस देखता रहता है
और जो समाज की क्रूर नदी में
बहता-चोट खाता
बस एक तिनके की तरह होता है
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है

 १५ 

यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जो गुदड़ियों में
देह को ढंकने की कोशिश करता  है
और जिसके सामने
आलमारियों में कपड़े सजाने वाले
नंगे हो जाते हैं
और जिस भूखे के पास
अनाज के मालिक
भूख मिटाने पहुँचते हैं
और जिस छतहीन  के सामने
महलों वाले
रात में 
चुपके से 
दरवाजा खोल कर खड़े हो जाते हैं
और जो जहाँ पैदा होता है
वहीँ कब्र में समाता भी है
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है

१६

यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जिसकी जिन्दगी में
कोई रंग नहीं होता
जो कोरा पैदा होता है
और कोरा ही मर जाता है 
लेकिन अनेक लोग
जिसकी जिन्दगी से 
अपनी जिन्दगी रंगीन करते  हैं
और जो
अपनी मैली फटी चादर पर
आराम की नींद सोता है
लेकिन जिसे
लोगों की मखमली चादर
कांटेदार महसूस होती है
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है

१७

यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जिसकी चर्चा
संसद में गूँज कर
वहीँ मर जाती है
जिसके घर
कुछ पल के लिए जा कर  
समाज सेवी
अखबारों में अपनी तस्वीर
छपवा लेते हैं
उसकी व्यथा कथा
जगह जगह सुनाते हैं 
ग़रीबों का मसीहा 
कहलाने के लिए नाटक करते हैं
और इस नाटक के बाद
जिस आदमी को भुला दिया जाता है
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है

शनिवार, 12 मार्च 2011

यह हाशिये पर के उस आदमी की कविता है-११-१३


११
यह हाशिये पर के उसी  आदमी की कविता है
जिसके जीवन में
नहीं होता है कोई मनोरंजन   
क्योंकि वह तो स्वयं  
दूसरों का मनोरजन होता है
मनोरंजन की मशीन होता है
जो नाचता है
गाता है
पहनता है
सोता है
सब कुछ करता है दूसरों  के लिए
और इस समाज में
उसका अपना
अगर कुछ होता है
तो
वह उसके आंसू होते हैं
आँहें होती हैं
लेकिन उनको भी जो
किसी के सामने प्रकट नहीं कर पाता
यह हाशिये पर के उस आदमी की कविता है

  १२

यह हाशिये पर के उस आदमी की कविता है
जिसे पशुधन
समझा जाता है  
और जिसे
मंडी में विक्रय के लिए
खड़ा कर
बोली लगायी जाती है
अंग-अंग की बोली
साँस-सांस की बोली
मन-आत्मा की बोली-
मन के भाव -पचास रुपए
आत्मा की कीमत-
महीने भर की रोटियाँ
और जिसकी कीमत
बाजार में
बड़ी जल्दी घाट जाती है
ताकि वह घुट-घट कर
संसार से अंतिम विदायी  ले सके
और जो राजनीति  का विषय बन  सके
यह हाशिये पर के उसी  आदमी की कविता है

१३
 
यह हाशिये पर के उसी  आदमी की कविता है
जिसके शरीर  पर
सभ्य लोगों की
उँगलियाँ
हजारों  चीटियों की तरह
रेंगती हैं
जिसके शरीर पर
सभ्य लोगों के दांत
मधुमक्खियों की तरह
डंक मारते हैं
और जिसे कुछ लोग 
अपने रेशमी बिस्तर पर
विषैले काँटों की चुभन देते हैं
और जो रोटियों 
के लिए 
रोने, चींखने की जगह
नकली मुस्कान बिखेरता रहता है
यह हाशिये पर के उसी  आदमी की कविता है








रविवार, 30 जनवरी 2011



यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जो हर सुबह भोजन की तलाश में
चिड़ियों की तरह निकलता है
और दिन में
यहाँ-वहाँ
कहीं भी
गोश्तखोरों का निवाला बन जाता है
बार-बार जूठा किया जाता है
और जो
गोश्तखोरों  द्वारा
खुले में
अछूत कहा जाता है
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है



यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जिसकी जांघों पर
असमय
अनेक लाल फूल
खिला दिए जाते हैं
और जो आदमी
समझ भी नहीं पाता है
उन अचानक उग आये  फूलों को
और जब वह
उन्हें  समझ पाता है
उससे समझने का अधिकार ही
छीन लिया जाता है
और जिसकी आत्मा पर
महात्मागण
योग करते हैं
यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है




यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जिसे यह पता नहीं चलता
की वह दिन में सांस ले रहा है
या रात में
उसकी रात को
लोग
अपने लिए
दिन में बदल देते हैं
और उसके दिन को
अपने आराम के लिए अँधेरे में
और जिसकी  ज़िंदगी
दिन हो या रात
हमेशा अँधेरा-अन्धेरा ही महसूसती  है
और जो
अपनी मौत से
अपने दर्द को सुला देता है
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है



यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जो कठपुतली की तरह
माना जाता है
या बना दिया जाता है
कुछ फर्क के साथ-
असली कठपुतली के शरीर का
प्रयोग किया जाता है
स्वस्थ मनोरंजक  अभिव्यक्ति के लिए 
लेकिन हाशिए पर का आदमी
वह  कठपुतली होता है
जिसके शरीर का उपभोग
अनेक तरीके से किया जाता
और जिसे 
अपने रोते-कराहते दिल के साथ
हँसते हुए
खिलखिलाते हुए
अच्छी अभिव्यक्ति भी  देनी होती है
और जो आदमी
कठपुतली के सामने भी
बौना नज़र आता है
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है




यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जिसे शरीफ लोग
अपनी पत्नी और बच्चों के सामने
पूरी दृढ़ता के साथ
बदचलन की संज्ञा देते हैं
और एकान्तता में
जिसका रोम-रोम निगल जाते हैं
जिसके शरीर पर लोग
चींटियाँ छोड़ देते हैं
और जिसको
बिखरने तक
शरीफ लोग
बदचलन बनाए रखते हैं
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है

 ६

यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जो दिन-रात  मेहनत करता है
खून जलाता है
और जो हमेशा
खून जलाने के कारण
पीलिया ग्रस्त रहता है
और जो
बहते पसीने की बदबू से
दिन-रात सराबोर होता है
और जिसकी ऎसी ज़िंदगी के कारण
अनेक लोग
इत्र से स्नान करते हैं
और जो
अपने होने की कीमत
रोज चुकाने के बाद भी
सतत ऋणी बना रहता है
और जिस पर
समाज के सारे सूदखोर
अपने-अपने हिसाब से
बेहिसाब सूद लेते हैं
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है



यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जिसके दिल को
किराए पर चढ़ा  दिया जाता है
और जिसे किरायेदार को ही
किराया देना पड़ता है
और जिसकी आत्मा  पर
आम सड़क बना दी जाती है
और जिस पर बूट वाले लोग
बूट पटकते  हुए बार-बार गुजरते हैं
और जिसके सपनों पर
कफ़न डाल  दिया जाता है
या जिसके सपने चुरा लिए जाते हैं
और जिसके विश्वास की भ्रूण ह्त्या कर दी जाती है
और जिसे
मांगे मौत भी नहीं मिलती
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है



यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जिसके लिए
दुखदायी बाढ़ आती है
भयावह सूखा आता है
और ऐसे में
जिसकी राहत का कौर
कोई ओहदेदार निगल जाता है
और जिसको सौ-सौ बीमारियाँ
उपहार में दी जातीं हैं
और जिसे दुःख के कांटेदार गहने
ठेकेदार लोग
अपने सुख के लिए पहनाते हैं
और जिसे कपड़े दिए जाते हैं
आदेश पर
उतारने के लिए
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है



यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जो अपने शरीर पर लगे
घावों को गिन नहीं पाता
और न उन्हें सहला पाता है
लेकिन वही लड़खड़ाता आदमी   
तरोताजा और दमखम वाले लोगों का
बैसाखी बन जाता है
और जो शांति के साथ
अशांति को झेलता है
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है

१०

यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जो समस्त कोटि की त्रासदियों का
एक मात्र
पर्यायवाची शब्द होता है
और जो सम्पूर्णता में
दुःख का जीवित पुतला होता है
और जिस पुतले से
लोग सुख का दोहन करते हैं
और जो दूहे जाने के बाद भी
अगले  दिन स्वयं कहता है
कि उसकी दुखती रगों में
दूसरों  के लिए कुछ सुख
अभी भी शेष है
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है

२२

यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जो रागदरबारी गाए
या तांडव करे
उसे  फांकनी  पड़ती है
हमेशा  ही धूल
क्योंकि
उसके सिक्के के
चित और पट
दोनों ओर
अंकित होता है
हार शब्द 
और जो अपनी हर हार को
अपनी जिन्दगी मान लेता है
यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है

२३

यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जो आदमी
जब तक
अपने जीवन के सुर-ताल
समझना शुरू करता है
लोग अपने सुर-ताल
उस पर अवतरित कर देते हैं
मदद के नाम पर
दया के नाम पर
उसको उपहार में देते हैं भारी जंजीरें
और उसके हृदय, मन, आत्मा,शरीर
सब पर
जंजीरें कस देते हैं
और जो हकीकत में
बिना शुरू हुए ही
समाप्त हो जाता है
यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है

२४

यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जो हर परिस्थिति में
इस्तेमाल की वस्तु होता है
और जिसकी
हर सांस से लेकर
आत्मा  तक
मंडी में बिकाऊ होती
फिर भी जिसे लोग
मूल्यहीन
अधम
अछूत
आदि संज्ञाओं से विभूषित करते हैं
और इन सब के  बावजूद
जिसकी मंडी
सबसे बड़ी होती है
यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है

२५

यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जिसकी माँ का सिर
अपनी ही जमीन पर
झुका होता है
और जिसका बाप
लापता होता है
और जो सभ्य  समाज के बीच
वैसे ही फंसा होता है
जैसे
जाल में
कोई मछली फंसी होती है
मछली तो एक ही बार
फंसती है और बिकती है
लेकिन जो
जाल में बार-बार
फंसाया और बेचा जाता है
यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है

२६

यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जिसकी गिरफ्तारी
हर वारदात के बाद
सिर्फ शक के आधार पर
हो जाती है
और जिसके तलवे पर
डंडे मार-मार कर
अपराध स्वीकार
करा लिया जाता है
वह अपराध
जिसे उसने कभी
सपने में भी  नहीं किया
फिर भी भुगतता है जो जेल की यातना
यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है

२७

यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जो अपनी खुली आँखों से
तब कुछ भी नहीं देखता
जब सभ्य लोग
उसे हृदय-स्थल पर
यज्ञ -अनुष्ठान शुरू करते हैं
विशेष पराक्रम दिखाते हैं
और ऐसे अवसर पर
जो आदमी लाश बन जाता है
क्योंकि
लाश ही पीड़ा से मुक्त होती है
उसे नोचो-खसोटो  या फिर
जला दो
क्या फर्क पड़ता है
और जो सामाजिक यज्ञ  में
विष के साथ होम किया जाता है
यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है

२८

यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जो कभी भी
समय का हिसाब नहीं रखता
क्योंकि
कोई भी समय उसका अपना नहीं होता
वह तो
हमेशा दूसरों के समय का
दास होता है
गुलाम होता है
और जिसे लोग
अपने समय के आगोश में
खून से लथपथ कर देते हैं
और जो
अपनी मौत के लिए भी
दूसरों के समय का मोहताज़ होता है
यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है  

२९

यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जो लावारिश होता है
और जो कूड़े के ढेर पर
लावारिश कुत्तों द्वारा धमकाया जाता है
फिर भी जो
चुनता है, कांच,कागज, लोहा,
और जिनके हाथों से वे भी
छिन  जाते हैं
असली से एक चौथाई मूल्य पर
और जो कभी-कभी
कूड़े पर पा लेता है
पुराने जूतों की  एक विषम जोड़ी
और उसे पहन कर
जो जूता-धारक होने का
सपना पूरा करता है
यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है


३०

यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जो हमेशा ही
देखा जाता है शक की नज़र  से
और जिस पर से
शक मिटाने के लिए
लोग करते हैं अनेक प्रयोग
और योग
और जिसके ऊपर से शक
तब विलीन हो जाते हैं
जब वह प्रयोग में होता है
और प्रयोग से मुक्त होते ही
जिसके शरीर पर
शक के जंगल फिर से उग जाते हैं
और जिसके मरने
और जीने
दोनों  पर शक किया जाता है
यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है

३१

यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जिसकी मृत्यु
ईश्वर तय नहीं करते
जिसे यमराज
नरक या स्वर्ग नहीं ले जाते
बल्कि
जिसकी मृत्यु
शरीफ लोग
हर दिन
हर रात तय करते हैं
और जिसकी कोई भी मृत्यु
अंतिम नहीं होती
और जिसकी हर मृत्यु
संस्कार के विलोम से होती है
और जिसका फिर से जन्म भी
संस्कार के विलोम से ही  होता है
यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है

३२

यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जो हादशों  के शहर में
जन्म लेता है
और
बड़ा होता है
हर दिन
छोटा किए जाने के लिए
और जिसकी हर रात
दूधिया रोशनी में
अँधेरे के साथ कटती है
और जो जंगली जानवरों  से नहीं डरता
लेकिन जो
गिरगिट को
किसी कीट की ओर बढ़ता देख
सिहर-सिहर जाता है
यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है

३३

यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जिसकी कहानी
पत्थरों को पिघला देती है
लोहे को गला देती है
हीरे को मुलायम बना देती है
लेकिन जिसकी वही कहानी
बड़े लोगों के हृदय को
छू भी नहीं पाती
और जो
ऐसे काठ के लोगों के साथ
अपना सब कुछ खो देता है
यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है

३४

यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जो वैसी निरीह मछली की तरह होता है
जो उसे निगलने के लिए
जल में ध्यान लगाए
बगुलों को पहचान नहीं पता है
और जो दान के वस्त्रों को
पहनते हुए यह
नहीं सोच पता है
कि वह बहेलियों  का जाल पहन रहा है
और जब उसकी आँखें खुलती हैं
और जब वह
बहेलियों को पहचान लेता है
और तभी  उसे यह पता चलता है कि
उसे अपनी आँखें बन्द ही रखनी चाहिए
और जो
बहेलियों के जाल में ही
अपना पूरा जीवन गुजार देता है
यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है

३५

यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जिसे तूफ़ान थमने तक ही
बाँहों में रखा जाता है
और फिर रद्दी की टोकरी में
डाल दिया जाता है
और जो घर की तलाश में
बादलों की तरह भटकता है
और फिर पहाड़ों से टकरा कर
अपना अस्तित्व ही खो देता है
सब की सेवा में तिरोहित हो जाता है
और जो सिर्फ
पर हित के लिए ही
जीवन पाता है
यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है

३६

यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जो वह हरा-भरा पेड़ होता है
जिसे असमय
भू लुंठित कर दिया जाता है
और जिसके तनों  को
सुखाया जाता है
मौसम दर मौसम
खुले में
रखा  जाता है
छीला-काटा जाता है
जिसमें कीलें ठोकीं जाता हैं
और जिसे  कभी
पलंग तो कभी कुर्सी
बना दिया जाता है
यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है

३७

यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जो अनचाहे बच्चे पैदा करता है
और जो
अपने बच्चों को
बचपन  नहीं दे पाता
खिलौने भी नहीं दे पाता
क्योंकि वह तो स्वयं ही
एक खिलौना होता है
और जिस खिलौने की इंद्रियाँ
जीवित किन्तु
शिथिल होती हैं
और जो
अपने को खिलौने वाले  जीवन से
कभी मुक्त नहीं कर पता है
यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है

३८

यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जो बिना बचपन देखे
जो बिना बचपन खेले
जवान हो जाता है
और जिसके अंग-अंग से
लोग खेलते हैं
और जो बूढ़ा  होने से पहले ही
मर-खप जाता है
लेकिन जो मरने के पहले
तड़पता है
रोता है
बिलखता  है
और जो हिचकियों के बीच
समाप्त  हो जाता है
यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है

३९

यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जो स्वयं के लिए
स्वयं चिंतन नहीं करता
अगर करता
तो कर लेता आत्महत्या
इस पाप से बचने के लिए
जो जीवन भर
दूसरों के चिंतन
दूसरों के सपनों
को पूरा करता रहता है
और जो जीवन में
एक भी अपराध नहीं करता
लेकिन जो
पूरी जिन्दगी
जीता है अपराध बोध में
यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है

४०

यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जो मानव निर्मित  भंवर में
जन्म लेता है
और उसी भंवर में
पूरी जिन्दगी
निरीह सा फंसा होता है
फिर भी जिसे
नर्तन सिखाया जाता  है
उन लोगों के द्वारा
जो नर्तन नहीं जानते स्वयं
और जिसकी जिन्दगी
फिरकी की तरह
घूमते-घूमते
चकराकर
अचानक
एक दिन
धराशायी हो जाती है
यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है

४१

यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जो दूसरों की फसल
काटते-काटते 
एक दिन
स्वयं बन जाता है
दूसरों की फसल
और जो दूसरों के लिए
अन्न उगाते-उगाते
एक दिन स्वयं अन्न बन जाता है
और जो
दूसरों को पानी  पिलाते-पिलाते
जो स्वयं पानी बन जता है
और बह जाता है
किसी बदबूदार नाली में
यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है

४२

यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जिसे ईश्वर
शायद
अन्य आदमी की सेवा के लिए ही
जन्म देता है
मौत देता है
लेकिन जिन्दगी नहीं देता
और जन्म के बाद
समाज जिसके दिल पर
ताले जड़ देता है
और जिसको
महसूसने की आजादी नहीं दी जाती
और  अगर
उसे आम आदमी की जिन्दगी मिलती
उसमें भी महसूसने की क्षमता होती
और अगर उसका भी दिल
आजाद होता
तो शायद वह जी ही नहीं सकता
पल भर के लिए भी
क्षण भर के लिए भी
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है

४३

यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जो शायद आदमी होते हुए भी
ईश्वर की संतान होते हुए भी
नहीं कर सकता
मंदिर में प्रवेश
और इसी लिए
मंदिर में प्रवेश पाने वाले
उसे अधर्मी/ अधम/नीच/कुलटा/अज्ञानी
और न जाने कितने विशेषणों से
करते हैं मंडित
और करते हैं उसके मान को खंडित
फिर भी जो
मंदिर के द्वार पर
एक टुकड़ा प्रसाद पाने के लिए
चिलचिलाती धूप में
खड़ा रहता है
और जिसे एक टुकड़ा प्रसाद
तृप्त कर देता है
भवसागर  पार लगा देता है
और जो ईश्वर से हमेशा दूसरों के लिए
दुआ मांगता है
और जो स्वयं स्वर्ग का हकदार  बन जाता है

४४

यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जो हर बारात के
स्वागत की तैयारी  का
अहम् हिस्सा होता है
अपना खून और पसीना लगाता है
और इस दौरान
जो अपनी बेटी के हाथ
पीले करने की बात
सोच भी नहीं पाता
और जब तक वह
सोचना शुरू करता है
उसकी बेटी की शादी की उम्र
गुजर जाती है
और जो
अपने को एक गुनहगार
मानता  हुआ
कब्र में समा जाता है
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है

४५

यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जो ना-नुकुर किए बिना
किसी पर भी
हठात विश्वास कर लेता है
या विश्वास करना
जिसकी मजबूरी होती है
और जो
बार बार
विश्वासघात झेलता है
यह सोचते हुए कि
एक न एक दिन
कोई विश्वसनीय मिल  जायेगा
लेकिन धीरे धीरे
जो जान लेता है कि
जब तक लोग उसका विश्वास
तोड़ रहे  हैं
तभी तक
आदमी के बाज़ार में
उसकी कीमत शेष है
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है

४६

यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जिसकी जिन्दगी
पतंग की तरह होती है
और जिसे लोग
अपने स्वार्थ के आकाश में
पतंग की तरह उड़ाते  हैं
पतले धागे से बांध कर
दूसरी पतंगों से
लड़ाते-उलझाते हैं
चूहे की जान जाए
बिल्ली का खेल
और इस खेल में
जैसे ही पतंग कटती है
धरती पर खड़े लोग
जिसकी चिद्दियां उड़ा देते हैं
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है






















यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जो बार बार बिकता है
और बार-बार नया मालिक पाता है
पर जिसके लिए
 मालिक बदलना
 कोई अर्थ नहीं  रखता
 क्योंकि फ़ंदे बदल जाते हैं
 पर गला तो उसी का रह जाता है
 बैल हल में जुते
 या कि कोल्हू में
 बात बराबर है
 ओर जो
 अपने पैर से
 सिर्फ़ दूसरे के लिए चलता है
 यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है

  १२


 यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
 जो विष को
 अमृत बना सकता है
 जो दुख को
 सुख को समझ सकता है
 जो अपने ऊपर हुई हिंसा को
 प्रेम मान सकता है
 जो अपनी मृत्यु को
 सृजन कह सकता है
 लेकिन जो
 अपने जीवन को
 अपना जीवन नहीं कह सकता
 यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है

  १३
            
 यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
 जो ठंड में कांपते हुए
 गर्मी में उबलते हुए, बरसात में भींगते हुए
 अपने पसीने की गंध से
 कभी उबरता नहीं
 और जो
 अपनी छाती पर
 दिन रात उगाए गए घावों को
 फूंक-फूंक कर सुलाता है
 स्वयं जागते हुए
 यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
                4
 यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
 जो बेचारा
 मालिक के पशुओं का
 चारा काटते - काटते
 स्वयं चारा बन जाता है
 और जो
 अपने राजा के महल के लिए
 पत्थर तराशने के बाद
 अपना हाथ भी
 तराशे जाने के लिए
 आगे बढा देता है
 यह  हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
5
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जिसका
मंदिर में प्रवेश
निषेध है
और इसीलिए
मंदिर में प्रवेश पाने वाले
जिसे अधर्मी, अधम और न जाने क्या-क्या कहते हैं
और फिर भी जो
मंदिर के द्वार पर
पूरी श्रद्धा के साथ
भगवान के प्रसाद की
याचना करता है
और जिसे
एक टुकड़ा प्रसाद
तृप्त कर देता है
और जो
बिना कुछ मांगे
स्वर्ग का हकदार बन जाता है
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
                 6
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जिसकी मां का सिर
अपनी ही जमीन पर
झुका होता है
और जिसका बाप
लापता होता है
और जो सभ्य समाज की मदद
के बीच
वैसे ही फंसा होता है
जैसे
जाल में
मछली फंसी होती है
मछली तो एक बार फंसती है
और एक ही बार बिकती है
लेकिन जो बार-बार
जाल में फंसाया जाता है
और जो बार-बार बेचा जाता है
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
             -7-
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जो दिन में
पूरा का पूरा अछूत होता है
और रात में
पान की गिलोरी बन जाता है
और दर्द भरी रात के कटने पर
जो अहले सुबह
पीकदान में
शेष रह जाता है
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
           8-
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जो सूने में या भीड़ में
रात में या दिन में
या जो खड़ी फ़सलों के बीच
बेबस खेत हो जाता है
और जो सबके द्वारा
छुए जाने के कारण
अछूत हो जाता है
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
            9-
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जो ह्रदय से मेरे लोगों के बीच
अपने धड़कते ह्रदय को
अपनी अतड़ियों से बांध कर
गोश्त-सा पेश हो जाता है
और जो खुली आखों में
सब कुछ देखते हुए भी
कुछ नहीं देखता है
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
          10-
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जिसकी भूख को
उसकी भूख ही मारती
जिसकी इच्छ को
उसके कदम ही रौंदते हैं
जिसके सपने को
उसकी नींद ही
तोड़ती है
और जो बेड़ियों के साथ
पैदा होता है
और गले में पट्टी बांधे
कूच करता है
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
         11-
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जो जीवन भर
अपने जीवन पर नहीं सोचता
अगर वह सोचता तो
किसी गंदी गली में
पागलों सा भटकता होता
इस लिए वह नहीं सोचता है
कि वह आग में जल रहा है
या बर्फ़ में गल रहा है
और जो अपने को समय की धारा में
बहने के लिए
पत्थरों पर पटके जाने के लिए
छोड़ देता है
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
           12-
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जिसकी बेजरूरत जिन्दगी
दूसरों की जरूरत होती है
जिसकी बेहिसाब जिन्दगी
रोज हिसाब देती है
और जिसकी जिन्दगी में
कोई जिन्दगी नहीं होती
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
             13-
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जिसका जीवन
जिसका जिस्म
हर रोज
कतरा-कतरा
दूसरों के द्वारा खर्च होता है
और जिस दिन
उसके ह्रदय पर
घाव नहीं गढा जाता
वह चिकोटी काट कर
खुद को परखता है
कि वह जिन्दा है कि नहीं
और अपने को जिन्दा पा कर
जो हर दिन कांप उठता है
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
          14-
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जो जोड़ते-जोड़ते
घट जाता है
जो गुणा करते-करते
भाज्य हो जाता है
और एक दिन
जो टहनी से टूटे फ़ूल की तरह
पंखुड़ी-पंखुड़ी बिखर जाता है
निचुड़ा हुआ
सुगन्धहीन हो कर
धूल में मिल जाता है
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
               15-
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जो गोबर के कीट की तरह
जन्म लेता है
और बरसाती कीट की तरह
छिपकिल्लियों का निवाला बन जाता है
और जो
जीवन तथा मृत
दोनों की अवस्थाओं में
भोज्य होता है
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
             16
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जो बाहर में हंसता है
अंदर से रोता है
जो जीवन में मौत
और मौत में जीवन तलाशता है
और इस दरम्यान
अपने लिए हमेशा हारता है
और दूसरों के लिए जीतता है
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
             17-
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जो गले में घंटी टाग कर
वा हाथ में लुक्का लेकर
दूसरों को पतित होने से बचाता है
और स्वंम
अनंत पिढियों तक के लिए
पतित की संज्ञा ढोता है
और जो
तथाकथित दानी लोगों को
अपनी माटी तक
दान में दे जाता है
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
   यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जो अपनी राह
कभी नहीं बना पाता
लेकिन वह दूसरों के लिए
पहाड़ तोड़ता है
राह बनाता है
और जो स्वयं
एक दिन
किसी संकड़ी-गंदी गली में
मर कर भी
अपने बाप दादों का कर्ज नहीं चुका पाता
और जो अपनी संतति के लिए
हर दिन सुरसा की तरह बढने वाला कर्ज
छोड़ जाता है
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
          19-
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जो मात्र कर्म में अधिकार रखता हो
फ़ल में कदापि नहीं
क्यों कि उसका जीवन
स्वयं में
दूसरों के लिए
फ़ल होता है
दूसरों की पूंजि होता है
और जो जीवन के
हवन कुंड में
अंजूरी-अंजुरी
अर्पित कर दिया जाता है
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
          20-
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जिसका सारा सच ही
जो दूसरों को अस्तित्व देता है
और स्वयं अस्तित्वहीन है
जो दूसरों को कंठ देकर
अपना गला घोंटे रहता है
जिसकी पूरी जिन्दगी
एक गीत है
और जिसके कानों में
गला हुआ रांगा
भर दिया जाता है
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
          21-
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जिस पर मौत की छाया तो है
पर मौत नहीं है
जो दर्द के बीच जन्मा तो है
पर रोता नहीं है
जो कांटों को झेलता है
पर चुभन महसूसता नहीं है
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
           22
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जो सुख दुख के भेद को
नहीं जानता
जिसे अपने रोने पर
हंसी आती है
जिसे अपने होने पर
न होने का अहसास होता है
और जो
हाड़ मांस वाला प्राणी हो कर भी
मात्र मशीन होता है
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है