सोमवार, 14 मार्च 2011

१४- १७हाशिए........

१४

यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जो दस को सुलाने के बाद
स्वयं सोना भूल जाता है
और जो
स्वयं पर लिखी जा रही
रोती-बिलखती पंक्तियों वाली
तड़पती-कांपती कविताओं को
पढ़ नहीं पाता
और जो हमेशा अर्ध-चेतना में
विवश चूहे की तरह
बिल्ली का खेल
मूक बन कर
बस देखता रहता है
और जो समाज की क्रूर नदी में
बहता-चोट खाता
बस एक तिनके की तरह होता है
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है

 १५ 

यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जो गुदड़ियों में
देह को ढंकने की कोशिश करता  है
और जिसके सामने
आलमारियों में कपड़े सजाने वाले
नंगे हो जाते हैं
और जिस भूखे के पास
अनाज के मालिक
भूख मिटाने पहुँचते हैं
और जिस छतहीन  के सामने
महलों वाले
रात में 
चुपके से 
दरवाजा खोल कर खड़े हो जाते हैं
और जो जहाँ पैदा होता है
वहीँ कब्र में समाता भी है
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है

१६

यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जिसकी जिन्दगी में
कोई रंग नहीं होता
जो कोरा पैदा होता है
और कोरा ही मर जाता है 
लेकिन अनेक लोग
जिसकी जिन्दगी से 
अपनी जिन्दगी रंगीन करते  हैं
और जो
अपनी मैली फटी चादर पर
आराम की नींद सोता है
लेकिन जिसे
लोगों की मखमली चादर
कांटेदार महसूस होती है
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है

१७

यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जिसकी चर्चा
संसद में गूँज कर
वहीँ मर जाती है
जिसके घर
कुछ पल के लिए जा कर  
समाज सेवी
अखबारों में अपनी तस्वीर
छपवा लेते हैं
उसकी व्यथा कथा
जगह जगह सुनाते हैं 
ग़रीबों का मसीहा 
कहलाने के लिए नाटक करते हैं
और इस नाटक के बाद
जिस आदमी को भुला दिया जाता है
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है

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