मंगलवार, 15 मार्च 2011

१८ - २१ हाशिए पर के



१८

यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जिसकी जांघों पर
असमय
अनेक लाल फूल
खिला दिए जाते हैं
और जो आदमी
समझ भी नहीं पाता
अचानक उग आये फूलों को
और जब वह
उन्हें समझ पाता है
उससे समझने का अधिकार ही
छीन लिया जाता है
और जिसकी आत्मा पर
महात्मागण
योग करते हैं
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है

१९

यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जिसके सपनों के ऊपर
लोग अपने सपने जड़ देते हैं
और जिसके रोते हांफते ह्रदय पर 
लोग घाव बना देते हैं
और उस पर नमक
छिड़क देते हैं
और जिसकी  दुखती रगों पर
लोग छेड़-छाड़  करने से
कभी बाज नहीं आते हैं
और जिसे लोग
अपना   काम पूरा होते ही   
एक झटके में
बाहर का रास्ता दिख देता हैं
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है


२०

यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जो यह हिसाब नहीं रख पाता कि
कितनी बार उसकी साँसें फूलीं
कितनी बार उसकी आत्मा चींखी
कितनी बार उसका दिल दरका
कितनी बार उसके प्राण
कंठ में अंटके
और जिसे लोग परदे में
बेपर्दा करते हैं
और खुले में
कानी आँख से भी नहीं देखते
और जो
अपनी छोटी सी जिन्दगी में
अनेक बार मौत से सामना करते हुए
मिट्टी में मिल जाता है
और जिस मिट्टी पर
किसी के आंसू नहीं गिरते
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है

२१

यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जिसकी झोपड़ी
वक्त वक्त पर
फरेबी आशिकों की
महफ़िल बन जाती है
और तब
उसकी झोंपड़ी का हर तिनका
उसके तन-बदन में
सूई की तरह
चुभन पैदा करने लगता है
वह जो अपनी झोंपड़ी के अन्दर
और झोंपड़ी के बाहर
भय की चादर में लिपटा होता है
और जिसकी जिन्दगी
तभी तक चलती है
जब तक
लोग उसे भयभीत करते रहते हैं
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है







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