यह हाशिये पर के उस आदमी की कविता है
जिसके मौन के पीछे
एक उफनती हुई नदी
पहाड़ों
जंगलों
को चीरती हुई
सदियों से कसी हुई मुट्ठी को
खोलने
लोहे के लोगों को
आदमी होने का
अहसास कराने
चली आ रही है
और जो आदमी
सदियों तक
गले तक
मिटटी में दफ़न रहने के बाद
ज्वालामुखी बनने जा रहा है
यह हाशिये पर के उसी आदमी की कविता है
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें