रविवार, 25 सितंबर 2011


यह  हाशिये पर के उस आदमी की कविता है    
जिसके मौन के पीछे 
एक उफनती हुई नदी
पहाड़ों 
जंगलों
को चीरती हुई
सदियों से कसी हुई मुट्ठी को
खोलने
लोहे के लोगों को
आदमी होने का
अहसास कराने 
चली आ रही है
और जो आदमी
सदियों  तक
गले तक
मिटटी में दफ़न रहने के बाद
ज्वालामुखी बनने  जा रहा है
यह  हाशिये पर के उसी आदमी की कविता है


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