शनिवार, 12 मार्च 2011

यह हाशिये पर के उस आदमी की कविता है-११-१३


११
यह हाशिये पर के उसी  आदमी की कविता है
जिसके जीवन में
नहीं होता है कोई मनोरंजन   
क्योंकि वह तो स्वयं  
दूसरों का मनोरजन होता है
मनोरंजन की मशीन होता है
जो नाचता है
गाता है
पहनता है
सोता है
सब कुछ करता है दूसरों  के लिए
और इस समाज में
उसका अपना
अगर कुछ होता है
तो
वह उसके आंसू होते हैं
आँहें होती हैं
लेकिन उनको भी जो
किसी के सामने प्रकट नहीं कर पाता
यह हाशिये पर के उस आदमी की कविता है

  १२

यह हाशिये पर के उस आदमी की कविता है
जिसे पशुधन
समझा जाता है  
और जिसे
मंडी में विक्रय के लिए
खड़ा कर
बोली लगायी जाती है
अंग-अंग की बोली
साँस-सांस की बोली
मन-आत्मा की बोली-
मन के भाव -पचास रुपए
आत्मा की कीमत-
महीने भर की रोटियाँ
और जिसकी कीमत
बाजार में
बड़ी जल्दी घाट जाती है
ताकि वह घुट-घट कर
संसार से अंतिम विदायी  ले सके
और जो राजनीति  का विषय बन  सके
यह हाशिये पर के उसी  आदमी की कविता है

१३
 
यह हाशिये पर के उसी  आदमी की कविता है
जिसके शरीर  पर
सभ्य लोगों की
उँगलियाँ
हजारों  चीटियों की तरह
रेंगती हैं
जिसके शरीर पर
सभ्य लोगों के दांत
मधुमक्खियों की तरह
डंक मारते हैं
और जिसे कुछ लोग 
अपने रेशमी बिस्तर पर
विषैले काँटों की चुभन देते हैं
और जो रोटियों 
के लिए 
रोने, चींखने की जगह
नकली मुस्कान बिखेरता रहता है
यह हाशिये पर के उसी  आदमी की कविता है








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