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यह हाशिये पर के उसी आदमी की कविता है
जिसके मौन के पीछे
एक उफनती हुई नदी
पहाड़ों
जंगलों
को चीरती हुई
सदियों से कसी हुई मुट्ठी को
खोलने
लोहे के लोगों को
आदमी होने का
अहसास करने
चली आ रही है
और जो आदमी
सदियोह तक
गले तक
मिटटी में दफ़न रहने के बाद
ज्वालामुखी बन्ने जा रहा है
यह हाशिये पर के उसी आदमी की कविता है
.2
यह हाशिये पर के उसी आदमी की कविता है
जो शोषण की आग को
चीर कर निकलने की तैयारी में है
और स्वयं तपता जा रहा है
और जिसके तपन से
आस पास के संवेदनहीन पहाड़
मृत पत्थर
पिघलते चले जा रहे हैं
और जो धुंए से निकल कर
अब आग बनने जा रहा है
और जिसके भय से
कटीली झाड़ियां भाग रही हैं
यह हाशिये पर के उसी आदमी की कविता है
3
यह हाशिये पर के उसी आदमी की कविता है
जो दूसरों का हाथ
दूसरों का पैर
और दूसरों का शरीर बन कर
नहीं रहना चाहता
और जिसने अपनी विवशता को
अपने इरादे से रोक दिया है
और जो बिना कोई नारा दिए
स्वयं क्रांति बनता जा रहा है
पहाड़ी नदी की तरह
बहता जा रहा है
यह हाशिये पर के उसी आदमी की कविता है
4
यह हाशिये पर के उसी आदमी की कविता है
जो खूनी पहाड़ों
और हिंसक जंगलों को
बार-बार आगाह कर रहा है
सामाजिक बनने के लिए
समतल होने के लिए
वह वैसे पहाड़ों और जंगलों को
पैदा करता चला आ रहा है
जिनमें संवेदना की नदी
कलकल करती है
जिनमें करुणा की झीलें
अमृत से भरी हैं
और जिनमें प्रेमपूरित चिड़ियों का वास है
और जो एक नई दुनिया की बुनियाद
रख रहा है
यह हाशिये पर के उसी आदमी की कविता है
5
यह हाशिये पर के उसी आदमी की कविता है
जिसके हाथ में
वह वाण लग गया है
जो खारे समुद्र को सुखा सकता है
जो रावण की नाभी के अमृत घट को
छिन्न-भिन्न कर सकता है
और जो
अहंकार रूपी काले बादल को उड़ा कर
तपते रेगिस्तान में ले जा सकता है
वहां उसे बरसने के लिए मजबूर कर सकता है
और परिणामत:
अस्तित्वहीन कर सकता है
और जो बहरों को
उनका इतिहास सुनाने जा रहा है
और जो अपने मौन में शिव शब्द भर रहा है
यह हाशिये पर के उसी आदमी की कविता है
6
यह हाशिये पर के उसी आदमी की कविता है
जो परिवर्तन का
चक्रवात बनता जा रहा है
पृथ्वी का नया
चित्रकार बनता जा रहा है
जिसकी शब्दहीन भाषा
कानून बनने जा रही है
जिसके पांवों की जंजीर
न्यायाधीश का दंड बनने जा रही है
जो मानवता की कलम से
धरती पर इतिहास लिखेगा
और जो
आकाश पर अपना मानवीय संदेश
यह हाशिये पर के उसी आदमी की कविता है
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