४७
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जो दूसरों का
जो दूसरों का
घर बनाते बनाते
स्वयं बेघर हो जाता है
और जो
हर गृह-प्रवेश के बाद
अपने हाथों बनाए घर के लिए
अछूत हो जाता है
और जो
दूसरों के परिवार की सेवा करते करते
अपना परिवार भूल जाता है
और एक दिन लावारिश
मर जाता है
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
४८
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जो दूसरों को
भोजन कराते कराते
एक दिन
स्वयं
भोजन बन जाता है/और
जो पान की गिलोरी की तरह
चबाया और चूसा जाता है
और अंततः
पीकदान के हवाले कर दिया जाता है
जो रसहीन होने के बाद
बाज़ार के कूड़ेदान में
समर्पित कर दिया जाता है
और शेषतः
खाद या और कुछ.....!
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
खाद या और कुछ.....!
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
४९
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जो रात का खिलौना
और दिन का
चाकर होता है
जिसका कोई पता नहीं होता
पर जो लापता भी नहीं होता
जिसका कोई परिचय नहीं होता
पर जिसका परिचय
बड़े बड़े लोग
बनाते और बिगाड़ते रहते हैं
और जो
हर नए परिचय में
ढल जाता है
और मरने से पहले जो
अपने सारे
परिचयों से
मुक्त हो जाता है
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है