रविवार, 29 जनवरी 2012

khand kavy--हाशिए पर का आदमी


हाशिए पर का आदमी


दिलीप तेतरवे






माता विमला प्रकाशन
307-हरिओम टावर, सर्कुलररोड, रांची(झारखण्ड)

अपनी बात

मैं हाशिए पर का आदमी हूँ. मेरी जिंदगी के गरीबी के दिन, मेरे दिल और दिमाग में, आज भी  गहरे बैठे हैं. उन दिनों मैंने जो अपमान झेला, उसे मैं नहीं भूल सकता. मेरे ऊपर, जिनको, जब मन आया, आरोप पर आरोप मढ़ते चले गए. विवादस्पद लोगों ने मुझे विवाद में डालने या डुबाने का प्रयास किया. मैंने गरीबी और उससे जनित अनेक समस्याएं झेली हैं. जब मैं गरीबी झेल रहा था तो अपने भी मुझसे शिष्टाचार बरतना भूल गए थे. गरीबी एक ऐसी बीमारी है, जो आदमी को तब कमजोर बना देती है, जब वह उसके दबाव में झुकने लगता है, हाथ फ़ैलाने लगता है. गरीबी में किसी से आर्थिक सहयोग लेना, मेरे विचार में बहुत ही दुखदाई होता है.
    सच्चे मन और प्रण के साथ संघर्ष करने पर गरीबी पर विजय पायी जा सकती है- यह मेरा अनुभव कहता है. गरीबी  से मुक्ति  पाने  के  बाद गरीबों को









इस बात के लिए आश्चर्य नहीं करना चाहिए कि उसे परिवार के सदस्य ढूँढने लगते हैं और आदर देने लगते हैं. समाज उसे पुकारने लगता है.
     मेरा काव्य, "हाशिए पर का आदमी" गरीबों और पद-दलितों की कथा-व्यथा है. इस काव्य में  मैंने उनकी निराशा और आशा, दोनों पक्षों को देखने का एक छोटा सा प्रयास किया है. निराशा से उबरने के लिए हौसले और हिम्मत की जरूरत पड़ती है. मैं यही हौसला और हिम्मत दे कर, ग़रीबों के जीवन में उम्मीद की किरण पहुँचाना चाहता हूँ.


                             आपका ही,
                                                  दिलीप तेतरवे 
  
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जो रात का खिलौना
और दिन का
होता है चाकर
जिसका कोई पता नहीं होता
पर जो लापता भी नहीं होता
जिसका कोई परिचय नहीं होता
पर जिसका परिचय
बड़े बड़े लोग
बनाते और बिगाड़ते रहते हैं
और जो
हर नए परिचय में
ढल जाता है
और मरने से पहले जो
अपने सारे
परिचयों से
मुक्त हो जाता है
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता
                                                                              
 यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जिसकी जांघों पर
असमय
जबरन
अनेक लाल फूल
खिला दिए जाते हैं
और जो आदमी
समझ भी नहीं पाता
अचानक उग आये फूलों को
और जब वह
उन्हें समझ पाता है
उससे समझने का अधिकार ही
छीन लिया जाता है
और जिसकी आत्मा पर
महात्मागण
करते हैं योग
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
                                      ३





यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता है
जिसके सपनों के ऊपर
लोग अपने सपने जड़ देते हैं
और जिसके रोते हांफते ह्रदय पर 
लोग घाव बना देते हैं
और उस पर नमक
छिड़क देते हैं
और जिसकी  दुखती रगों पर
लोग छेड़-छाड़  करने से
कभी बाज नहीं आते हैं
और जिसे लोग
अपना काम पूरा होते ही  
एक झटके में
बाहर का रास्ता दिखा देते हैं
यह हाशिए पर के उसी आदमी की कविता ह
                                     ४








         

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